premanand ji mharaj ekantik vartalaap Ep-65
Premanand ji maharaj vartalap
In this episode, Premanand Ji Maharaj provides spiritual guidance to devotees struggling with external influences and internal conflicts. He
Key takeaways
- Character (Charitra) is the most valuable asset; losing it renders all worldly wealth useless.
- To cultivate a deep love for Vrindavan, one should regularly recite the glories of Shri Ji.
Main topics
- Preservation of Character
- Dealing with Bad Company
Notable quotes
Charitra hi hamara bhag hai, charitra hi hamari mahanta hai.
Conclusion
The episode serves as a motivational guide for maintaining spiritual p
Transcript preview
Speaker 3 (0:09) वरन जी बैंगलोर से Speaker 1 (0:11) राधा बलोशी Speaker 2 (0:12) अरिवेंश Speaker 3 (0:12) महाराजी आपके चरणों में कोटी कोटी प्रणाम महाराजी मैं बैंगलोरू में रहता हूँ वहाँ मैं जॉब करता हूँ महाराजी मेरे जो रूम मेट हैं वह बहुत ज़्यादा दिन में मास मदिरा का सेवन करते हैं आसुर Speaker 1 (0:39) जैसे रावण की नगरी में रहके विविश्वन जी ने भक्ती की ऐसी करना पड़ेगा। किसका आपका प्रश्न है, किसका है। जैसे रावण की नगरी लंका में रहके विविश्वन जी ने है कठीन यद्यपी, दुराचारी और अभक्ष भक्षन करने वाले लोगों के शं� Speaker 1 (1:08) देखो पूरी लंका में आशुरी प्रवत्ति का ही तो तांडव है लेकिन विविश्वन जी एक भगवान की भक्ती में जीम दर्शननिमो जीव बिचारी बत्यस दातो की बीच में जैसे जीव ऐसे कुशंगी जन है और अगर हमारा लक्ष भजन है तो फिर पर है कठिन क्योंक Speaker 1 (1:36) और कुषंगियों के संग से तो अशंभव ही है प्रारंभ में जो उत्तम भजनानन्दी फिर उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता जो रहीम उत्तम प्रकति का कर शकत कुषंग चंदन विश्व्यापत नहीं लप्टे रहत भुजंग परिसिस्तिती तक पहुँचने के लि� Speaker 1 (2:05) वाश अलग हो जा कैसे भी तो फिर नहीं तो असर तो होता है और जो भगवदानन्द में मगन है तो फिर Speaker 1 (2:18) अविरा तेरी जोपडी गलकटों के पास करेगा सो भरेगा तू क्यों हो तू उदास तर ऐसी स्थिति तो चाहिए अविसी स्थिति के लिए सत्संग चाहिए कुछंग नहीं तजोरिमन हरी बिमुखन को शंग जाके शंग कुमति मति उपजै करत भजन में भंग तू असुब � Speaker 1 (2:48) दोस करत निरसंक रंक कर संतन जानत अभिमानी गर्विष्ट लोब मद मत्य गाधा दुष्ट परिहरो दूरी भजत भरिश्री हरिरादा महापुरुषों का आचारियों को तो ऐसा आदेश है कि ऐसे दुष्ट जनों से दूरी बना कर रहे और भगवान के भजन में प्रिया प अशंभ हो हाँ इस्थिति प्राप्त हो गई तो फिर कोई बात नहीं तो अभी तो इस्थिति प्राप्त नहीं है प्रारंभिक भजन है पिरिष्मे हमें वातावरण का बहुत बड़ा सातिक वातावरण सातिक लोगों की बीच में रहना सातिक तो हमारा लक्ष केवल धन ही नह Speaker 1 (3:45) हट जाना चाहिए, जहां अपना चरित्र नष्ट हो जाए, वहाँ धन क्या करेगा, संसारी आदमी क्या होता है, वो अपने चरित्र को भी बेच देता है, चरित्र ही हमारा भाग है, हमारी महनता इसी बात की रहेगी, कि हम अपने चरित्र को दूशित ना होने दें, खान पान, उठना बैठना, देखना, यह हमारा पवित्र होना चाहिए, मनुष्य जन्मे मिला है, देव दुर्लभ योनी कही गई है, यह तो सब आशुरी प्रवत्ती के भूले हुए लोग हैं, बेचारे, नहीं जानते हैं, इनको मनुष्य रूपेन म्रगाश चरन्ती सास्त् Speaker 1 (4:34) भक्ति हीन मनुष मुर्दा ही है जिन हरि भगत यहरदय नहीं आनी जीवित शव शमानते प्रानी मुर्दे की तरह पवित्र लोग हैं मुर्दा जिसमें चैतन्यता ही नहीं रह गई है इनमें वो अध्यात्मिकी चैतन्यता ही नहीं रह गई सराब पी रहे हैं मांस खा रहे हैं शत मार्गे के लिए अच्छे बनो, दूसरों को शुक दो, अपने में कम खर्चा करके वो पैशे बचाओ, बुढ़े माता पिता, भीमार जनों की शेवा, किसी ऐसे भूखे को भोजन, ऐसी जो अवेवस्ता है, उसको वेवस्ता कर दिया, दद्दस रुपे जोड लिये, दोस दूशनों के प्रति जो शुक्य की भावना है वो तुम्हारी उन्नती करेगी दूशनों को जो दुख देने की भावना है तुम्हारा नाश कर देगी उसको दुख पहुंचे न पहुंचे तुम्हारा पतन हो जाएगा तो इसलिए हमारी तुरा यही है कि कमरा बदल दो उनका Speaker 1 (6:03) भगवान के अवतार तो भगवान है ही है स्री राम जी पर रावन भी कोई छोटा मोटा अवतार थोड़ी भगवान का पार्शत जो भगवान का स्वरूप ही है वैसे भी अगर इस परंपरा से लोग परंपरा से देखा जाए तो भगवान का अवतार रघुवंश में हो